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पांडू पुत्र नकुल की कलयुग यात्रा

कलयुग में हर डाल पर 'दुर्योधन' बैठा है । जब एक दुर्योधन ने हमें द्वापर युग में नाक में दम कर दिया था तो समझो आज की हस्तिनापुर की हालत क्या होगी ?

Nakul's Journey to Hastinapur in Kalyug पाठकों की तरफ से 

कलयुग में हर डाल पर 'दुर्योधन' बैठा है । जब एक दुर्योधन ने हमें द्वापर युग में नाक में दम कर दिया था तो समझो आज की हस्तिनापुर की हालत क्या होगी ?

हजारों वर्ष हो गए परन्तु हस्तिनापुर की यादें अभी भी हमारी जहन में है । दुर्योधन भैया आज भी द्रौपदी से आँखे नही मिला पाते हैं और शकुनी मामा तो हमारे साथ कोई भी खेल खेलने से कतराते है। भ्राता कर्ण आज भी अपने दिए हुए वचन पे कायम रहते है और इसका फायदा उठाने मे  मैं, सहदेव और अन्य कौरव अनुज बिल्कुल पीछे नही रहते ।

वर्षो से मेरी इक्छा हस्तिनापुर जाने की है परन्तु भ्राता कर्ण और युधिष्ठिर हर बार यह कह कर की अभी हस्तिनापुर जाने का सही समय नही है मेरी बात को टाल देते है । बार बार नहीं जाने का कारण पूछने पर भ्राता भीम ने एक दिन आवेश में आ कर कह दिया की कलयुग में हर डाल पर ‘दुर्योधन’ बैठा है । जब एक दुर्योधन ने हमें  द्वापर युग में नाक में दम कर दिया था तो समझो आज की हस्तिनापुर की हालत क्या होगी ?

मेरा चंचल मन अब भी भैया भीम की बातें मानने को तैयार नहीं था । वह बार बार यह सवाल उठा रहा था की अगर भ्राता दुर्योधन बदल सकते है तो कलयुग के दुर्योधन क्यों नहीं ? हस्तिनापुर को फिर से देखने की इच्छा और भीम भैया की बातों पर अविश्वास मुझे धरती पर जाने के लिए अधीर कर रहा था । मुझे पता था की यहाँ से निकलना इतना आसान नहीं होगा । इस समय मुझे सहदेव से बेहतर कोई और विकल्प समझ नही आ रहा था जो मेरी मदद करे । सहदेव को मैंने अपनी योजना बताई और उसे वचन दिया की मैं चार पहर में वापस आ जाऊंगा । सहदेव ने हर बार की तरह इस बार भी मेरा साथ दिया इस वचन पर की मैं अपनी पहचान गुप्त रखूँगा और अपनी शक्ति का प्रयोग किसी भी परिस्थिती में नहीं करूंगा ।

अपनी जन्मभूमि के स्पर्श मात्र से मेरी भावुकता ने सारी सीमाएं लांघ दी । मैंने थोड़ी देर विश्राम करने के बाद हस्तिनापुर घूमने का निर्णय लिया । अभी मेरी आँख लगी ही थी की मैंने अपने आप को 15-20 लोगों से घिरा पाया । वो लोग अलग अलग अस्त्र- शस्त्र से सज्जित थे । इससे पहले की मैं कुछ बोल पाता उन लोगों नें मेरे उपर अपनी पूरी शक्ति से प्रहार कर दिया । मेरी भी इक्छा हुई की इन्हें इनके इस वर्ताब की सजा दूँ  लेकिन मैं फिर से अपने भाइयो पर प्रहार नहीं करना चाहता था । उनमे से एक नें मुझसे मेरा परचिय पूछा- मेरे यह कहने पर की में हस्तिनापुर निवासी  हूँ , वे सभी जोर जोर से हँसने लगे । उनमे से एक ने  कहा – मैं कोई पागल हूँ जो कलयुग में भी स्वर्ण आभूषण से सज्जित है । अचानक किसी नें पीछे से मेरे सिर पर जोर का प्रहार किया और मैं मुर्छित हो गया ।

मेरी मूर्छा टूटी , सूरज सर पे आ गया था । मैं जल्द से जल्द हस्तिनापुर का भ्रमन पूरा करना चाहता था । शहर मे प्रवेश करते ही मैंने देखा, हमारी राजधानी का नाम ही नहीं उसकी रूप रेखा भी पूरी तरह बदल चुकी थी । वातावरण इतना दूषित था की मुझे सांस लेने में दिक्कत महसूस हो रही थी । लोग एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए दो/चार पहिया वाहन का उपयोग कर रहे थे , जो वातावरण को प्रदूषित किए जा रहा था । मैं पास के जलाशय की ओर अपनी प्यास बुझाने के लिए बढ़ा परन्तु वहां का दृश्य बड़ा ही भयावह था । जलाशय का  पानी देख कर ऐसा लगा जैसे उसे ग्रहण लग गया हो । मैं प्यासा ही दक्षिण दिशा की ओर चला । कुछ दूर चलने पर देखा की कुछ लोग एक व्यक्ति को घेरे हुए  थे । पास जाने पर देखा कि एक नवयुवक दर्द से कहार रहा है। धरती उसके रक्त से लाल हो गयी थी । उसकी माँ लोगों से चीख चीख कर मदद माँग रही थी । मैं उस युवक की और बढ़ा ही था की एक बूढ़े व्यक्ति ने मुझे वहां ना जाने का इशारा दिया और कहा की मेरे और मेरे परिवार के लिए बेहतर होगा अगर मैं इस में ना पडू । मेरे सामने उस युवक ने अपने प्राण त्याग दिया ।

मुझे अब भीम भैया की बातें सही लग रही थी । आज यह नकुल चक्रवुय्ह में अभिमन्यु की वीरगति के बाद पहली बार इतना असहाय महसूस कर रहा था । मेरा मन व्याकुल हो गया था , मैने व्यथित मन से  हस्तिनापुर से प्रस्थान करने का निर्णय किया । अकस्मात मुझे एक स्त्री के स्वर सुनाई दिए, मैं उस स्वर की और भागा । वहां के दृश्य ने मुझे द्रौपदी के चीरहरण की याद दिला दी। मैं उस स्त्री की रक्षा के लिए आगे बढ़ा लेकिन सहदेव को दिए हुए वचन ने मेरे कदम रोक दिए। मैंने लोगों से मदद की अपेक्षा की थी, लेकिन कोई भी नहीं आया।शायद कलयुग में कृष्ण को ढूँढना मेरी गलती थी । मैं इस बार वो गलती नहीं करना चाहता जो हम पांच भाइयों ने वर्षो पूर्व की थी । प्राण जाए, वचन न जाए को अनसुना कर मैंने अमानवीय कृत करते मानव रूपी शैतानों पर प्रहार किया । मेरी शक्ति क्षीण हो गयी थी । एक बार फिर नकुल असहाय ,कमजोर, लाचार , एक बेबस स्त्री की रक्षा करने में असमर्थ था ।

मेरा दिल बार बार यह सवाल पूछ रहा था की क्या इसी दिन के लिए हम ने धर्मयुद्ध किया ? क्या फायदा ऐसे धर्मयुद्ध  की जीत का जिसके बाद अधर्म अपनी जड़े और भी गहरी कर ले ? क्या इसलिए हमने अपनी मातृभूमि को अपनों के रक्त से लाल कर दिया था?

 

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